भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए, देशभर में विशेष कैंसर केंद्रों की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम रही है। ये अस्पताल, मरीजों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद की एक किरण बनकर आते हैं। वाराणसी में स्थित महामना कैंसर सेंटर भी इसी उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था। लेकिन हाल ही में, इस प्रतिष्ठित संस्थान के खिलाफ कुछ बेहद गंभीर और चिंताजनक आरोप सामने आए हैं, जो न केवल अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं, बल्कि मरीजों के जीवन और भरोसे को भी दांव पर लगाते हैं।
एक शिकायतकर्ता ने भारत सरकार से इस अस्पताल को ‘बंद’ करने की अपील की है। उनका आरोप है कि अस्पताल की कार्यप्रणाली इतनी जटिल और धीमी है कि पहले चरण के कैंसर का इलाज कराने आए मरीज, अनावश्यक जांच और प्रक्रियाओं में फंसकर अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। शिकायत के अनुसार, “अगर किसी मरीज को कैंसर पहले चरण में है, तो उसका इतना चेकअप करते हैं कि कैंसर अंतिम चरण में चला जाता है और मरीज का इलाज नहीं हो पाता है, जिससे मरीज की मृत्यु हो जाती है।” यह आरोप अपने आप में इतना गंभीर है कि इस पर तुरंत और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।

शिकायत की जड़: बेवजह की देरी और जांच का अंतहीन सिलसिला
शिकायतकर्ता के अनुसार, महामना कैंसर सेंटर में इलाज का तरीका मरीज के लिए एक अंतहीन प्रतीक्षा और जांच का सिलसिला बन जाता है। जब एक मरीज, खासकर कैंसर के शुरुआती चरण में, अस्पताल पहुंचता है, तो उसका सबसे बड़ा भरोसा यही होता है कि उसे तुरंत और प्रभावी इलाज मिलेगा। कैंसर जैसी बीमारी में, समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है। एक दिन की देरी भी कैंसर कोशिकाओं को फैलने और रोग को अधिक गंभीर बनाने का मौका दे सकती है।
शिकायत के मुताबिक, अस्पताल में मरीजों को एक टेस्ट के बाद दूसरे टेस्ट, एक डॉक्टर के बाद दूसरे विभाग में भेजा जाता रहता है। इस प्रक्रिया में, हफ्तों और महीनों का समय बीत जाता है। इस दौरान, मरीज का परिवार न सिर्फ भावनात्मक और मानसिक तनाव से गुजरता है, बल्कि बार-बार हो रहे चेकअप का आर्थिक बोझ भी उठाता है। इन सब के बावजूद, जब तक इलाज शुरू होने का समय आता है, तब तक कैंसर का पहला चरण, जो आसानी से ठीक हो सकता था, अंतिम और लाइलाज अवस्था में पहुंच चुका होता है।
यह सिर्फ एक मरीज की कहानी नहीं है, बल्कि कई ऐसे परिवार हैं जो इस पीड़ा से गुजर चुके हैं। उनके लिए, यह सिर्फ एक बीमारी का बिगड़ना नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और जवाबदेही की कमी का नतीजा है। अस्पताल का नाम ‘महामना’ है, जो एक महान व्यक्ति के सम्मान में रखा गया है। लेकिन अगर ये आरोप सही हैं, तो यह नाम पर एक धब्बा है।
अस्पताल की भूमिका: क्या यह सिर्फ प्रशासनिक अक्षमता है या कुछ और?
यह गंभीर आरोप कई सवाल खड़े करता है। क्या यह अस्पताल के अंदर प्रशासनिक अक्षमता की वजह से हो रहा है? क्या स्टाफ की कमी है? या फिर जांच मशीनों और अन्य संसाधनों का अभाव है? इन सभी संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए, लेकिन शिकायतकर्ता के आरोपों में एक और गहरा संदेह छिपा है: क्या यह सब जानबूझकर किया जा रहा है?

क्या बार-बार होने वाले ये चेकअप और टेस्ट, अस्पताल के लिए राजस्व कमाने का एक जरिया बन गए हैं? क्या इलाज की देरी का मकसद मरीज को आर्थिक रूप से निचोड़ना है? एक कैंसर सेंटर, जो उम्मीद का प्रतीक होना चाहिए, अगर इस तरह की आर्थिक गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, तो यह मानवता के खिलाफ एक अपराध है। मरीजों का विश्वास पूरी तरह से टूट जाएगा और वे यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या निजी अस्पताल भी इतने असंवेदनशील हो सकते हैं।
सरकार से अपील: निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
ये आरोप इतने गंभीर हैं कि भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को इस पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। यह सिर्फ एक अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की विश्वसनीयता का सवाल है। एक मरीज की जान, किसी भी प्रक्रिया या नौकरशाही से ज्यादा कीमती होती है।
इसलिए, भारत सरकार से यह विनम्र और सशक्त अपील है कि:
- तत्काल जांच समिति का गठन: एक उच्च-स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच समिति का गठन किया जाए, जो महामना कैंसर सेंटर की कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा करे। इस समिति में चिकित्सा विशेषज्ञ, प्रशासनिक अधिकारी और कानूनी सलाहकार शामिल होने चाहिए।
- उपचार प्रोटोकॉल की समीक्षा: अस्पताल में कैंसर के मरीजों के लिए अपनाए जा रहे उपचार और जांच प्रोटोकॉल की समीक्षा की जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि क्या वे अंतरराष्ट्रीय मानकों और चिकित्सा नैतिकता के अनुरूप हैं।
- जवाबदेही तय करना: अगर जांच में लापरवाही, अक्षमता या किसी भी तरह की अनैतिक गतिविधि पाई जाती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रबंधन पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
- पारदर्शिता सुनिश्चित करना: सभी कैंसर केंद्रों में उपचार के समय, खर्च और प्रक्रियाओं को लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि मरीजों को धोखे से बचाया जा सके।
महामना कैंसर सेंटर, वाराणसी जैसे संस्थान, भारत के लिए गौरव का प्रतीक होने चाहिए, न कि बदनामी का कारण। मरीजों का जीवन और उनका भरोसा सबसे ऊपर होना चाहिए। सरकार को इस मामले में तुरंत कार्रवाई करके यह संदेश देना चाहिए कि किसी भी स्तर पर स्वास्थ्य सेवा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई न केवल न्याय प्रदान करेगी, बल्कि भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में लोगों के विश्वास को भी बहाल करेगी।