सुप्रीम कोर्ट में आज, 21 मई 2025 को, वक्फ अधिनियम 2025 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। यह अधिनियम 8 अप्रैल 2025 को लागू हुआ था, जिसे लोकसभा और राज्यसभा में क्रमशः 3 और 4 अप्रैल को पारित किया गया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 5 अप्रैल 2025 को इस बिल को मंजूरी दी थी। इस अधिनियम के खिलाफ 100 से अधिक याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, और अन्य संगठनों ने इसे संविधान के खिलाफ बताया है।
सुनवाई का विवरण
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं, आज इस मामले की सुनवाई कर रही है। इससे पहले, 17 अप्रैल 2025 को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई की थी, जिसमें केंद्र सरकार को याचिकाओं का जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया गया था। केंद्र ने 25 अप्रैल को अपना जवाब दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि 2013 से 2024 के बीच वक्फ संपत्तियों में 116% की वृद्धि हुई, जिसके कारण यह संशोधन जरूरी था।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
17 अप्रैल की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश दिए थे:
- वक्फ बाय यूजर या वक्फ डीड के तहत घोषित संपत्तियों को डिनोटिफाई नहीं किया जाएगा।
- केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्ड में कोई नई नियुक्ति नहीं होगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की जरूरत हो सकती है, खासकर गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने और वक्फ बाय यूजर की अवधारणा को हटाने जैसे मुद्दों पर। हालांकि, कोर्ट ने पूरे अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

याचिकाकर्ताओं के तर्क
याचिकाकर्ताओं, जिनमें असदुद्दीन ओवैसी, आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान, और जमीअत उलेमा-ए-हिंद शामिल हैं, ने निम्नलिखित आधारों पर अधिनियम को चुनौती दी है:
- धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि गैर-मुस्लिमों को केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्ड में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन है, जो धार्मिक समुदायों को अपनी धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है।
- वक्फ बाय यूजर का खात्मा: अधिनियम में वक्फ बाय यूजर (लंबे समय तक धार्मिक उपयोग के आधार पर संपत्ति को वक्फ मानना) को हटाने का प्रावधान है, जो कई ऐतिहासिक मस्जिदों और वक्फ संपत्तियों को प्रभावित कर सकता है। कपिल सिब्बल ने कहा कि यह प्रावधान संभल जामा मस्जिद जैसे स्मारकों को प्रभावित करेगा।
- मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर अतिक्रमण: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अधिनियम मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों का “रेंगता हुआ अधिग्रहण” है और यह उनके धार्मिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता को कमजोर करता है।
- अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन: अधिनियम को समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है, क्योंकि यह केवल मुस्लिम वक्फ संपत्तियों को लक्षित करता है, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों की संपत्तियों पर समान नियम लागू नहीं होते।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि यह अधिनियम वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए लाया गया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि:
- 2013 के संशोधन के बाद वक्फ संपत्तियों में 20,92,072.536 एकड़ की वृद्धि हुई, जो सरकारी और निजी संपत्तियों पर अतिक्रमण का कारण बनी।
- गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वक्फ बोर्ड एक प्रशासनिक संस्था है, न कि धार्मिक।
- यह अधिनियम संवैधानिक है और इसे संसद ने 38 बैठकों और 98.2 लाख प्रतिवेदनों की समीक्षा के बाद पारित किया।
केंद्र ने यह भी आश्वासन दिया कि सुनवाई पूरी होने तक कोई भी वक्फ संपत्ति डिनोटिफाई नहीं की जाएगी और न ही वक्फ बोर्ड में नई नियुक्तियां होंगी।

सुनवाई में उठे प्रमुख मुद्दे
- वक्फ बाय यूजर: मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 16 अप्रैल को कहा था कि वक्फ बाय यूजर को खत्म करना एक गंभीर संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है, क्योंकि कई मस्जिदें, जो 12वीं और 13वीं सदी में बनीं, बिना दस्तावेजों के वक्फ के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।
- गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति: कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्टों में मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जा सकता है। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक प्रशासनिक निकाय है, इसलिए गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति उचित है।
- हिंसा पर चिंता: कोर्ट ने अधिनियम के खिलाफ हो रही हिंसा को “बेहद परेशान करने वाला” बताया और कहा कि जब मामला कोर्ट में है, तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन उचित नहीं हैं।
राज्यों का रुख
छह बीजेपी शासित राज्य—मध्य प्रदेश, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, और छत्तीसगढ़—ने अधिनियम का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर की है। दूसरी ओर, केरल सरकार ने इस अधिनियम को संवैधानिकता के खिलाफ बताते हुए याचिका दायर की है।
आज की सुनवाई का महत्व
आज की सुनवाई में कोर्ट अंतरिम राहत पर विचार कर सकता है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग की है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि इस मामले को टुकड़ों में नहीं सुना जा सकता, क्योंकि यह पूरे समुदाय के अधिकारों से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पांच याचिकाओं पर ही मुख्य तर्क सुने जाएंगे, ताकि सुनवाई सुचारू रूप से हो।
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वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों, और संपत्ति प्रबंधन के मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे रही है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह अधिनियम मुस्लिम समुदाय की स्वायत्तता को कमजोर करता है, जबकि केंद्र सरकार इसे पारदर्शिता बढ़ाने का कदम बताती है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल वक्फ संपत्तियों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता के सवालों को भी नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।